सीतामढी हिन्दू आस्था केन्द्र

त्रेतायुग रामायण काल की जीवंत स्मृति प्रतीक ब्र हर्षि बाल्मिकी की तपोवन तथा लवकुश की जन्म और सीता की समाहित स्थली सीतामढ़ी में जारी रामायण मेला का सीधा संबन्ध लवकुश के जन्मोत्सव से है। पुराणों के अनुसार अषाढ़ मास के शुक्ल प्रतिपदा से लगने वाले गुप्त नवरात्र की पूर्ण रात्रि नवमी के दिन जानकी ने लवकुश को जन्म दिया था। उस दौरान बनदेवी के रूप में वि यात जानकी को दो—दो पुत्र होने की खुशी में वनवासी खुश हो गये थे तथा कई दिनों तक जन्मोत्सव मनाया जाता रहा। गंगा की कल-कल करती लहरों की तरंगों तथा पक्षियों के चहचहाट के मिश्रित संगीत से झूमते महौल में बनवासियों के उक्त लवकुश जन्मोत्सव की पंरपरा आज भी जारी है। अंतर सिर्फ यह कि तब वहां बन था, बनवासी और  ऋषि मुनि परिजन जन्मोत्सव को अपने तरह से मनाते थे। आज वह विकसित वसाहट का रूप ले लिया है। अब वहा आधुनिक स यता से सुसंस्कारित लोग रह रहे है। अब लवकुश जन्मोत्सव को रामायण मेले के रूप में मनाया जाता है।

कहने को तो मेले की शुरूआत तो गुप्त नवरात्र अषाढ़ शुक्ल पक्ष की प्रतिप्रदा से ही हो जाती है किन्तु विशाल मेला तो नवमी से तीन दिन पूर्व से ही जोर पकड़ता है। इस बार लवकुश जन्मतिथि नवमी 6 जुलाई को है। इस लिए बड़े मेले की शुरूआत तीन जुलाई  से हो रही है। आज भी इस रामायण मेले को लवकुश जन्मोत्सव के रूप में ही देखा और मनाया जाता है। नव दिन तक लगातार भजन कीर्तन प्रवचन का दौर रहता है। क्षेत्रीय महिलाएं मंगल गीत गाती बालमीक तपो स्थल के पास वाले वट वृक्ष की पूजन अर्चन करती है। यह मेला उसी स्थान पर लगता है जहां लवकुश के जन्म होने की मान्यता है। हालांकि कुछ लोग लवकुश के जन्म स्थल को वट स्थल से करीब 20 मीटर दूर सीता आश्रम को बताते है। वट स्थल को तो लवकुश की कर्मभूमि माना जाता है। मान्यता है कि जब भगवान राम ने अश्वमेघ यज्ञ किया था और दिग्विजय सुनिश्चित करने हेतु यज्ञ का घोड़ा छोड़ा था , तो लवकुश ने भगवान राम को घोड़ा पकड़ कर इसी बरगद के  वृक्ष में बाधा था । इतना ही नहीं जब घोड़ा खोजने हनुमान जी वहां पहुंचते और घोड़ा छोडऩे के लिए लवकुश से युद्ध किया तो लवकुश ने हनुमान जी को भी बंधक बना कर इसी बरगद के वृक्ष में बाध दिया था। गंगातट पर स्थिति इस वट वृक्ष का संबन्ध त्रेतायुग से है। यह मूल वृक्ष तो नही किन्तु इसका संबन्ध मूल वृक्ष शाखा बर्रोह से जरूर है। वर्रोह ही अब बड़े वृक्ष नजर आते है। राम जानकी मंदिर है उसी स्थान पर विशाल वट वृक्ष भी रहा होगा। जो कालातंर में समय चक्र के क्षरण का शिकार होकर गिर गया होगा किन्तु आसपास फैली उसकी उपशाखांए बर्रोह आज खुद  वट वृक्ष जैसे ही हो गये हे। मंदिर के उत्तर और दक्षिण तरफ मौजूद वट वृक्ष कुछ एेसा ही इतिहास उपस्थिति करता है। मान्यता तो यह भी है कि इसका रोपण स्वंय जानकी ने किया था और इसी के पूजन प्रताप से उन्होने लवकुश को पुत्र रूप में प्राप्त किया था। इतना नही अपने अंतिम काल में जब राम लवकुश युद्ध के लिए उतावले हुए तो बीच बचाव करने जानकी इसी वट वृक्ष के नीचे आयी और लवकुश का उनके पिता राम से परिचय कराया। जब बाप -बेटे गले मिलने लगे मौजूद ऋषि -मुनि जन जयजय कार शुरू किया तो जानकी इसी वट वृक्ष के नीचे खड़ी होकर अंतिम बार भगवान राम को निहारा और वेग से आगे बढ़ती करीब ढाई सौ मीटर दूर धरती में समा गई। जिसे सीता समाहित स्थल माना जाता है।

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