हल हर षष्ठी/ललही छठ पूजा विधि, व्रत का महत्व

हल हर षष्ठी/ललही छठ

हल हर षष्ठी या ललही छठ पूजा का हिन्दू पर्व में पुत्र प्राप्ति या पुत्र की लम्बी आयु के लिए बहुत महत्व है ये पूजा पुत्रवती स्त्रियों के द्वारा पुत्र की लम्बी आयु के लिये किया जाता है ये त्यौहार भाद्रपद में कृष्णपक्ष की षष्ठी (भादो के कृष्ण पक्ष के छठी) को मनाया जाता है इस पूजा को बलराम जयन्ती के रूप में भी मनाया जाता है यह किसानों का मनाया जाने वाला विशेष पर्व है इस दिन भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम या बलदाऊ का जन्म हुआ था उनका सबसे प्रिय शस्त्र हल है इसलिए इस त्यौहार को हल षष्ठी भी कहा जाता है।

ललही छठ में प्रयोग की जाने वाली पूजा सामग्री

पूजा से पहले महिलाओं द्वारा निम्नलिखित सामग्री एकत्र कर लेनी चाहिए-

1- भैंस का दूध] भैंस का घी] भैंस की दही] भैंस का गोबर

2- महुआ का पत्ता] महुआ का फूल और महुआ का फल

3- छ: छोटे मिट्टी के कुल्हण

4- छ: मिट्टी की दियली

5- महुये के पत्ते से बना दोना

6- अगरबत्ती, कपूर, सिन्दूर, रोली],रक्षा, पान,नया वस्त्र, बच्चों का खिलौना इत्यादि सामग्री होनी चाहिए।

विशेष :- जिन घरों में उस वर्ष शादी विवाह का उत्सव हुआ रहता है या पुत्र उत्पन्न हुआ रहता है उन्हें 12 कुल्हण मिट्टी का और 12 महुआ के पत्ते में सामग्री रखकर चढ़ानी पड़ती है।

ललही छठ की पूजा विधि

पूजा करने वाली महिलाओं को सुबह उठकर महुये के ठंठल से मुंह साफ करना चाहिए, स्नान करने के बाद नया वस्त्र धारण कर पुत्रवती स्त्रियां भैंस के गोबर से ललही माता का चित्र बनायें यद्यपि पूर्वांचल में ललही की पूजा सार्वजनिक स्थल जैसे तालाब, कुंआ, बावड़ी, बगीचा, नदी, गंगा आदि के किनारे किया जाता है वहां पहुंचकर महिलायें ललही माता का श्रृंगार करती हैं और विधि विधान से पूजा करती है।

हल हर षष्ठी या ललही छठ व्रत का महत्व

यह कहा जाता है कि जब किसी स्त्री को पुत्र पैदा होता है तो पुत्र की छहः महीने तक लालन पालन ललही माता करती है उन्हीं के द्वारा बच्चे को हंसाया जाता है और उसका पूरा ध्यान रखा बच्चे की रक्षा ललही माता करती रहें इसी के लिए यह परंपरा है कि जन्म के छठे दिन छठ पूजा की जाती है उस दिन महिलाओं द्वारा उत्सव कार्यक्रम किया जाता है।

कथा का महत्व

हल हर षष्ठी या ललही छठ की पूजा में कथा कहने और सुनने (श्रवण करने) का अपना विशेष महत्व है –

जमींदार की कहानी

एक गांव में हिन्दू धर्म मानने वाले लोगों की संख्या अधिक थी जहां एक जमींदार परिवार रहता था किन्तु जमींदार की कोई सन्तान नहीं थी। इस बात से जमींदार की पत्नी बहुत दुखी रहती थी एक दिन भादों महीने में उसके घर में काम करने वाली नौकरानी ने जमींदार की पत्नी से कुछ पैसे उधार मांगे जमींदार की पत्नी ने पूछा कि तुम ये पैसा क्या करोगी नौकरानी ने कहा कि मैं ललही माता का व्रत रखूंगी और पूजा करूंगी। जमींदार की पत्नी ने फिर पूछा कि तुम हमें बताओं कि इस व्रत का क्या लाभ होता है नौकरानी ने विस्तार पूर्वक इस पूजा को बताया तब जमींदार की पत्नी बहुत प्रसन्न हुयी और उन्होंने कहा कि हम ये पूजा देखने चलेंगे नौकरानी ने मालकिन को साथ में लिया और ललही पूजा करने चली गयी वहां जाकर मालकिन ने खड़ी होकर पूजा को भली भांति देखा और कथा सुना प्रसन्नता पूर्वक मालकिन ने यह सोचा कि माता जी यदि हमें भी पुत्र देंगी तो मैं भी यह व्रत करूंगी। ललही माता की कृपा से 9 महीने में मालिकन को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी तब से मालकिन प्रत्येक वर्ष बड़े धूम-धाम से ललही माता की पूजा करने लगी।

भैंस के दूध की कहानी

काशी प्रान्त में एक युवक-युवती का शादी-शुदा जोड़ा रहता था दोनों सरकारी नौकरी करते थे धन धान्य से भरपूर थे किन्तु उन्हें पुत्र प्राप्ति की बड़ी लालसा थी किन्तु बड़ी दवाई चिकित्सा के बावजूद भी संतान की प्राप्ति नहीं हुयी। एक दिन की बात है उनके पड़ोस में रहने वाली महिला युवती उनके घर आयी और पूछा कि क्या तुम्हारे दूध वाले ने भैंस का दूध दिया है। युवती ने पहले इंकार कर दिया किन्तु उसे पता चला कि महिला आज ललही का व्रत है जो भैंस का दूध यदि नहीं खायेगी तो वह भूखी रहेगी युवती ने उसके घर जाकर भैंस का दूध लेने का आग्रह किया महिला बड़ी खुश हुयी और आर्शीवाद देते हुये बोली तुम सुखी रहो युवती ने जवाब में कहा कि हम एक बात से दुखी है कि मेरे पास कोई सन्तान नहीं है महिला ने युवती से कहा कि बेटा तुमने हमें भैंस का दूध दिया है ललही माता तुम्हारी गोंद जरूर भरेंगी और तुम्हारी बात जरूर सुनेंगी आगे चलकर युवती को पुत्र पैदा हुआ और वह भी प्रत्येक वर्ष ललही माता का व्रत रहने लगी।

ग्वाला की कहानी

एक गांव में एक ग्वाला दूध का व्यापार करता था भादो महीने में जब ललही व्रत आया गांव वालों ने उससे भैंस के दूध की मांग किया ग्वाला के मन में यह सोच कर लालच उत्पन्न हुआ क्यों न हम गाय और भैंस का दूध मिलाकर ज्यादा से ज्यादा पैसा कमा लें। इसी विचार से ग्वाले ने गाय और भैंस का दूध मिलाकर पूरे गांव का बेचने निकल गया जब वह दूध बेचकर घर लौटा तो ललही माता के प्रकोप से उसके बेटे के मुंह से सफेद झाग निकल रहा था उसे समझने में देर न लगी और वह दौड़ते हुये गांव की ओर भागा और रोते चिल्लाते हुये गांव वालो से दूध में मिलावट की गलती के लिए माफी मांगने लगा गांव में व्रत करने वाली महिलाओं ने ललही माता से पूजा-अर्चना करते हुये माफ करने के लिए मिन्नत मांगी । ग्वाला घर जाकर देखता है कि उसका बेटा भला चंगा होकर खेल रहा है ग्वाले ने तब से मन में ठान लिया कि अब प्रत्येक वर्ष ललही माता की पूजा में भैंस का दूध मुफ्त में पूरे गांव में वितरित करेगा।

writer Abhilasha Chaturvedi

5 Replies to “हल हर षष्ठी/ललही छठ पूजा विधि, व्रत का महत्व”

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