मनोरम दृश्य है बाबा हरिहर नाथ का

श्रावण मास में जनपद के ज्ञानपुर मु यालय पर विराजमान बाबा हरिहरनाथ धाम की महिमा अपरमपार है जहां पर महीने भर से दर्शन पूजन , रूद्राभिषेक का कार्य चल रहा है । वैसे तो बारहों महीनें इस धाम में दर्शन पूजन करने वालों की भीड़ प्रति सोमवार को दिखाई पड़ती है । बाबा हरिहरनाथ धाम के बारे में मिली जानकारी के अनुसार बताया जाता है कि  इस प्राचीन मंदिर जिसका इतिहास लगभग दो सौ वर्ष पुराना है। यह ज्ञानसरोवर के पश्चिमी किनारे पर पूर्वाविमुख स्थित है। इतिहास बताता है कि उस समय यहाँ विशाल जंगल था। आज उन जंगलों का अवशेष देखा जा सकता है,जिसे सुंदर बन कहा जाता है। इन्ही जंगलों के बीच एक बावड़ी के रूप आज का ज्ञानसरोवर स्थित था। जिसमें स्नान करने से उस समय के लोगो के कोढ़ दूर हो जाते थे।

बताया जाता है कि  उस समय गाँव गिरांव में जिसे कोढ़ी कहा जाता था उसे गाँव से बाहर कर दिया जाता था। जो कोढ़ी गाँव से बाहर किये गये वे यहा आकर इसी जंगल में रहने लगे। भोजन के रूप में जंगली वनस्चपत्ति खाते थे। और इसी बावड़ी में स्नान करते थे। इस बात का स्पष्ट प्रमाण तत्कालीन अभिलेखो में मिलता है कि इस बावड़ी में स्नान करने वाले कोढ़ रोग मुक्त हो जाते थे। इस बात की  गूंज धीरे-धीरे पूरे उत्तर प्रदेश ,विहार,म$प्र. तक हो गया। कोढ़ से पीडि़त लोग लाभ प्राप्त करने लगे। कोढ़ रोग से मुक्ति  प्रदान करने वाले स्थान का नाम ही कोढ़ हो गया। बाद में रेलवे स्टेशन गोपीगंज का नाम भी कोढ़ रोड रखा गया। जब कोढ़ ज्ञानपुर हो गया तो कोढ़ रोड भी ज्ञानपुर रोड नाम रख दिया गया। भयानक कोढ़ रोग से मुुक्ति दिलाने वाले इस स्थान का इतना प्रचार -प्रसार हो गया कि राजा—रजवाड़ो और जमींदारो क ा भी ध्यान इधर गया। गंगापुर -वाराणसी के जमींदार ठाकुर हरिहर सिंह ने इस बावड़ी का सुंदरीकरण कराया  और एक कुएं का निर्माण भी इसके पश्चिमी किनारे पर कराया और इसी बावड़ी के किनारे एक विशाल शिव मंदिर का निर्माण कराया। कालांतर में वही बावड़ी ज्ञानसरोवर के नाम से वि यात हुई और ठाकुर हरिहर सिंह के परिवारवालोँ ने उनकी स्मुति में मंदिर का नाम ही हरिनाथ मंदिर रख दिया। हरिहर भगवान शंकर जी को भी कहा जाता है। अत: यह नाम काफी प्रचलित हुआ। धीरे-धीरे यहाँ स्थापित शिवलिंग की महिमा सिद्धपीठ के रूप में की जाने लगी। आज भी कुछ लोग यह दावा करते है कि यहाँ आकर जिसने निरछल भाव से कोई मनोकामना की यह अवश्य पूरा होता है। महाशिवरात्रि को यहाँ विशाल मेला लगता है जिसमें क्रमश: भदोही ,मिर्जापुर,इलाहाबाद,जौनपुर तथा म$प्र. के रीवा और विहार के डाल्टनगंज ,सासाराम आदि जनपदो से हजारो की सं या में दर्शनार्थी यहाँ आकर पूण्य लाभ प्राप्त करते है। वर्ष 19६5 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मु यमंत्री डा$ स पूर्णानंद जी ने पुन: मंदिर और ज्ञानसरोवर का जीर्णाेद्धार कराया और शासन द्वारा प्रतिवर्ष दो हजार रूपया इसके रख—रखाव व अन्य व्यवस्थाआें के लिए स्वीकृत किया है। इसके बाद इस मंदिर के परिसर में ही हनुमान जी,दुर्गा जी, शीतला माता, काल भैरव,काली माता सहित अन्य देवी देवताआे का मंदिर बना है जो बाबा हरिहरनाथ के परिसर को दर्शनीय स्थल के रूप में हो गया और यहाँ पर सुबह शाम आसपास के लोगो का दर्शन करने की भीड़ लगी रहती है। आज उसी ज्ञान सरोवर के निर्मली करण का अभियान लगभग 1१ महीने से समाज सेवियों और अधिवक्ताआें  के साथ नगर पंचायत अध्यक्ष हीरालाल मौर्य के नेतृतव में किया जा रहा है। यह बाबा हरिहरनाथ की महत्ता समझे या कुछ और कि तालाब के सुन्दरी करण में मशीनी उपयोग कभी सफल नहीं हुआ और श्रमदान के रूप में कार्य लगातार किये जा रहे है वह मानव अथवा पशुआे का उपयोग हुआ तो वह सफल है। लेकिन इतना तो मान्यता है ही कि बाबा हरिहरनाथ का श्रावण मास में दर्शन पूजन करने वाले का मनोकामना पूर्ण हो जाती है।

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