भारतीय संसद का ह्रास

भारतीय जनता को भारतीय संसद से आशाएं थीं कि यह ‘‘जन-साधारण की एक प्रभुत्वसंपन्न संस्था’’ के रूप में कार्य करेगी। जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में, ‘संसद राष्ट्रीय जीवन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था होगी और यह अन्याय व भ्रष्ट प्रशासन के विरूद्ध ढाल होगी।’ किंतु ऐसा लगता है कि नेहरू के अनुयायी और कांग्रेसी इन बात को भूल चुके हैं, क्योंकि जिस संसद में पैर रखने से पहले सांसद सदस्य मत्था टेकते थे और वहां से दबे कुचले और शोषित समाज की आवाज को बुलन्द किया जाता था अब वहां गाली-गलौच और अपशब्दों का अड्डा बन गया है संसद सामाजिक परिवर्तन और विकास का अपनी मुख्य भूमिका को खोती जा रही है इस संस्था में निर्माण की गतिशीलता व सामाजिक निरूपण का अभाव दृष्टिगत होता है। अब तो संसद अपने निजी या वर्गीय स्वार्थों को साधने की एक मशीन है, अब इसमें गंभीर चर्चाएं नहीं होती, दिखावटी और फूहड़ आवाजें सुनाई देती हैं, संसद में शोरगुल अधिक और काम कम होता है। राष्ट्रीय हितों की अवहेलना होती है, संकुचित क्षेत्रीय हित सर्वोपरित हैं, और दल के नेताओं का दबदबा निरंतर बना रहता है।
संसद की वर्तमान छवि 1950 से लेकर 1960 के दिनों तक के नैतिक आदर्शों और मूल्यों के बिल्कुल विपरीत दिखाई पड़ती है। उसका कारण यह कि उन दिनों सरकार का काम नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन जबकि विपक्ष का कार्य उनकी कमियों को उजागर करना और सांसद में प्रधानमंत्री से उसका जवाब लेना जबकि वर्तमान हालात यह है कि नरेन्द्र मोदी सरकार के चार साल पूर्ण होने जा रहे हैं किन्तु मुख्य विपक्षी कांग्रेस अभी भी इस सपने से बाहर नहीं आई कि वो सरकार में नहीं है कांग्रेसी नरेन्द्र मोदी के सत्ता मे ंआने के बाद से आज तक इस बात को नहीं पचा पा रहें हैं कि भारतीय जनता पार्टी आज एक मजबूत दल के रूप में शासन कर रही है यही कारण है कि प्रधानमंत्री के लिए मौत का सौदागर उदंण्ड और न जाने क्या-क्या शब्द दिये जाते हैं यह संसदीय गरिमा के बिल्कुल विपरीत है।
ऐसी परिस्थिति लाने में सरकार भी पीछे नहीं है सरकार का काम है कि वह विरोधी दलों के सदस्यों के विश्वास में लेकर उनके विभिन्न आंशकाओं पर समाधान प्रस्तुत करें और किसी नीति या कानून के निर्माण में उन्हें विश्वास में लेने का काम करें जो दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ता है। संसद में जब सत्र चलते हैं तो उसका सारा खर्च भारतीय नागरिकों के दिये गये टैक्स से पूरा होता है किन्तु धीरे-धीरे ऐसी परम्परा बनती जा रही है कि संसद का कोई सत्र अगर सुचारू रूप से चले तो यह मानों विपक्षियों की हार हो जाती है इसलिए जो मुद्दे प्रेस कांफ्रेस और जनसभाओं में किये जा सकते जिन शब्दों का प्रयोग सड़कों पर किया जा सकता है उनके लिए संसद को चुना जाता है और भारतीय जनमानस की गाढ़ी कमाई पानी में मिल जाती है प्रत्येक सत्र में अरबों रूपया भारतीय नेता बर्बाद करते हैं जिसका जनमानस को काई लाभ नहीं होता क्योंकि न तो वहां कानून बनता है और न ही किसी बेहतर मुद्दे पर विमर्श किया जाता है आपसी झगड़े और तू-तू मैं-मैं से सत्र को प्रारम्भ किया जाता है और समाप्त किया जाता है। यदि 1960 वाले संसद को याद किया जाये जहां विपक्षियों की संख्या कम होती थी उसके बावजूद भी सरकार और विपक्षी भारत के बड़े से बड़े मुद्दो को संसद भवन के अन्दर विचारों के माध्यम से समाधान करते थें किन्तु आज यह पंचायत कुछ चुने हुये टी0वी0 चैनलों पर किया जाता है और भारतीय संसद अप्रसांगिक बनती जा रही है। अब यह तर्क का सदन न होकर अविवेकी झगड़ों, घृणा, अवसरवाद तथा स्वार्थ का सदन बन गई है। संसद के ह्रास की चरमसीमा तब देखी गई, जब जून 1975 में आपात स्थिति की उद्घोषणा का अनुमोदन संसद ने 48 घंटों में बिना विचार किए कर दिया। 1967 से अब तक भिन्न-भिन्न राजनीतिक दलों के सदस्यों ने 1000 बार दल-बदल किया है, जो धन, पद की लोलुपता या स्वार्थों से प्रेरित होता है, जिससे देश में अनुशासनहीनता तथा राजनीतिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है।
संसदीय प्रणाली का एक सामान्य नियम है कि अध्यादेश का तरीका तभी चुनना चाहिए जब कोई आपातकालीन मामला हो। संसद के अपने पहले ही संबोधन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भरोसा दिलालया था कि उनकी सरकार संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा का ख्याल रखेगी। लेकिन उन्होंने शुरूआत ही अध्यादेश से की। पहला अध्यादेश इसलिए आया ताकि वे अपनी इच्छानुसार प्रधान सचिव चुन सकें। फिर, पोल्लावरम परियोजना के डूब-क्षेत्र का दायरा बढ़ाने के लिए। जिस भूमि अधिग्रहण कानून को भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए समर्थन दिया था उसे बदलने के लिए भी अध्यादेश लाया गया। ऐसे अध्यादेश लाने से संसदीय प्रक्रिया जनता में बने अपने सम्मान को खोती जा रही है। इस प्रकार से देखा जाये तो भारतीय संसद की गरिमा और परंपरा को मजबूत करने आगे बढ़ाने के बजाय सभी राजनीतिक दल और नेता इसे चोट पहुंचाने का भरपूर प्रयास कर रहें है।

(लेखक एन.कुमार)

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