भदोही का प्रशासनिक ढांचा

भदाही जनपद मूलरूप से वाराणसी से 30 जून, 1994 को अलग हुआ और इस जनपद के लिए एक दक्ष प्रशासनिक ढांचा का निर्माण किया गया जिसे इस प्रकार से समझा जा सकता है-

मुख्यालय- जनपद का मुख्यालय ज्ञानपुर में स्थित है जहां सभी आला अधिकारियों का ऑफिस है वर्तमान समय में जिलाधिकारी सहित यह मुख्यालय ज्ञानपुर से 5 किलोमीटर की दूरी पर सरपतहा नामक स्थान पर नया मुख्यालय बनाया गया है।

तहसील- जनपद को 3 तहसीलों में बांटा गया है ज्ञानपुर, भदोही, और औराईं।

ब्लाक/विकास खण्ड– भदोही जनपद को मुख्यतः 6 ब्लाक में विभाजित किया गया है जो क्रमशः इस प्रकार से हैं 1-डीघ विकास खण्ड, 2. भदेही विकास खण्ड, 3. औराईं विकास खण्ड, 4. सुरियावां विकास खण्ड, 5. ज्ञानपुर विकास खण्ड, 6. अभोली विकास खण्ड। इसमें गांवों की संख्या की दृष्टि से औराईं विकास खण्ड सबसे बड़ा है दूसरे नंबर पर भदोही है।

थाना- भदोही जनपद को पुलिस प्रशासन की सुविधा की दृष्टि से 9 थानों में विभाजित किया गया है जो क्रमशः इस प्रकार से है – 1. थाना दुर्गागंज, 2. थाना सुरियावां, 3. थाना चौरी, 4. थाना ऊंज, 5, थाना कोइरौना, 6. कोतवाली भदोही, 7. कोतवाली ज्ञानपुर, 8. कोतवाली औराईं, 9. कोतवाली गोपीगंज। ज्ञानपुर को छोड़कर अन्य सभी कोतवाली पहले थाना थे।

भदोही जनपद में कुल 79 न्यायपंचायत है और 1075 गांव है इस प्रकार से भदोही जनपद का प्रशासनिक और सांगठनिक ढांचा खड़ा किया गया।

भदोही जनपद का राजनैतिक स्वरूप

भदोही जनपद बनने के बाद परिसीमन से पूर्व भदोही मिर्जापुर जनपद मिलाकर मिर्जापुर भदोही संसदीय सीट बनाता था किन्तु वर्तमान में मिर्जापुर से अलग होकर इलाहाबाद के 2 विधानसभा हंडिया और प्रतापपुर को मिलाकर भदोही संसदीय सीट बनाता है।

भदोही जनपद में तीन विधानसभा है औराईं विधानसभा जो वर्तमान समय में एस.सी./एस.टी. के लिए सुरक्षित है, दूसरा भदोही विधानसभा और तीसरा ज्ञानपुर विधानसभा।

भदोही और गंगातट से संबंध

भदोही जनपद का यदि मानचित्र देखा जाय तो इसके दक्षिणी छोर से माँ गंगा की धारा सतत बहती है जिसके किनारे कई प्रसिद्ध घाट है जहां वार्षिक मेला, त्यौहार आदि का आयोजन होता है। रामपुर घाट जनपद का सबसे प्रसिद्ध गंगा घाट है जहां कार्तिक की पूर्णिमा पर अपार जनसैलाब के साथ मेला लगता है। रामपुर और सेमराध नाथ धाम के बीच में ज्ञानानंद गंगा घाट है बताया जाता है कि इस घाट का निर्माण वर्तमान के आदर्श ग्राम कौलापुर के पूर्वज कौलाबाबा और कुछ गणमान्य नागरिकों के सहयोग से बनाया गया है आज भी इस घाट पर अन्तिम संस्कार, सांस्कृतिक आयोजन आदि के लिए इस ग्राम के लोगों को प्राथमिकता प्राप्त है घाट के तट पर भव्य आश्रम है जो वास्तव में पर्यटकों को आकर्षित करने में सक्षम है।

सेमराध नाथ घाट बाबा सेमराध नाथ शिव जी के मंदिर के नाम से बना है यहां पर कई वर्षों से माघ महीने के समय एक माह का कल्पवास का आयोजन होता है।

सीतामढ़ी घाट सीतासमाहित स्थल के नाम से बना है जहां प्रत्येक वर्ष आषाढ़ माह के नौमी के दिन से एक सप्ताह का भव्य सांस्कृतिक आयोजन किया जाता है।

भदोही का इतिहास

राजनैतिक दृष्टि से-

भदोही नाम ‘‘भर राज्य’’ के नाम से पड़ा क्यांकि इस स्थान पर भरों का साम्राज्य था जो मुगलों से विद्रोह किये इसीलिए भर द्रोही स्थान को भदोही कहा जाने लगा यहां पर बहुत पहले भर राजा राज्य करते थे जिनके कई साक्ष्य आज भी इस जनपद में उपलब्ध हैं भर राजाओं का अपना एक गौरवशाली इतिहास रहा है किन्तु ये शासक बहुत ही अहंकारी, लड़ाकू और अत्याचारी भी थे एक बार इनका युद्ध मौनस राजा रामसिंह से हुआ था आगे चलकर भरों का युद्ध 1100 ई. के आस-पास मोहम्मद गोरी से भी हुआ था और भर राजा उसमें काफी आक्रामकता से लड़ाई लड़े थे समय के साथ आगे चलकर इस जनपद के क्षेत्र को मुगल शासक अकबर ने इलाहाबाद शासन के क्षेत्र में मिला लिया किन्तु आगे चलकर 1911 ई. में तत्कालीन काशी महाराज महाराजा प्रभु नारायण सिंह द्वारा भदोही क्षेत्र को काशी के रियासत में शामिल कर लिया तब से यह क्षेत्र काशी वर्तमान के वाराणसी में शामिल रहा धीरे-धीरे इसे अलग प्रशासनिक इकाई बनाने को लेकर मांग की गई इस मांग में जनपद के कई नेताओं जिसमें प्रमुख रूप से पूर्व केन्द्रीय मंत्री पंडित श्यामधर मिश्रा जो जवाहर लाल नेहरू कैबिनेट के सदस्य थे और पूर्व भाजपा विधायक स्व0 लाल चन्द्र पाण्डेय के साथ कई छोटे-बड़े नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। यद्यपि वर्तमान का भदोही जनपद की उत्पत्ति 30 जून 1994 दिन बृहस्पतिवार को तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार के मुखिया उ0प्र0 के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा इस जनपद के निर्माण की घोषणा की गई।

आर्थिक दृष्टि/कालीन की दृष्टि से

भदोही जनपद का नाम लेते ही कालीन का नाम इसके साथ बरबस ही जुड़ जाता है कालीन के इतिहास को बिना समझे भदोही का इतिहास अधूरा है ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार 16वीं सदी में आइने अकबरी से यह ज्ञात होता है कि विश्व में प्रथम कालीन लगभग 3000 ईसा पूर्व मिश्र वासियों ने बनाया था जो मिश्र से होता हुआ फारस वर्तमान नाम ईरान को 1935 तक फारस के नाम से जाना जाता था जहां भव्य हखमनी साम्राज्य था ईरान से होता हुआ यह कालीन की कला मुगलों के साथ भारत पहुंचा जहां जम्मू-कश्मीर से लेकर उत्तर प्रदेश तक समय के साथ फैल गया।

दरअसल 1580 में मुगल बादशाह अकबर ने आगरा, दिल्ली, लाहौर में कालीन बुनाई, कढ़ाई प्रशिक्षण केन्द्र खोला था एक बार मुगल शासक के सैनिक और व्यापारिक आगरा से जी0टी0 रोड के रास्ते बंगाल जा रहे थे रात्रि के समय उन्होंने भदोही जनपद के घोसियां माधोसिंह नामक स्थान विश्राम के लिए अपना डेरा डाल दिया वहां पर वे लोग कुछ दिन रूके  और ये देखा कि यहां रहने वाले जुलाहे (मुसलमान) इस कला को बेहतरी से सीख सकते हैं उनके द्वारा इन मुसलमानों के माध्यम से यहां भी कालीन बुनाई का कार्य शुरू किया गया जिसका मुख्य कारण था कि यहां मुसलमान कारीगर भारी मात्रा में सस्ते दर पर उपलब्ध थे और जो ईमानदारी और निष्ठा से इस कार्य को अंजाम दे रहे थे मुगलों के बाद अंग्रेज शासक भी इस कालीन की कला से खूब प्रभावित हुये उन्होंने 1851 ई. में कालीन को विश्व प्रदर्शनी में ले जाकर रखा जहां इसकी बुनाई कढ़ाई को सर्वोत्कृष्ट कला का दर्जा दिया गया आगे चलकर भदोही के कुशल कारीगरों के बल पर यहां का कालीन अन्य देशों के कालीन से श्रेष्ठ साबित हुआ।

धार्मिक इतिहास

भदोही जनपद का धार्मिक महत्व है इस क्षेत्र का इतिहास रामायण और महाभारत काल से संबंधित है रामायण काल में भगवान राम ने सीता को जब गृह निष्कासन किया था तो बताया जाता है कि सीता माता सीतामढ़ी में आकर समाहित हुयी थी।

बाबा तिलेश्वर नाथ का स्थान गोपीगंज से 2 किलोमीटर दक्षिण तिलंगा गांव में स्थित है इस मंदिर के लिए कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण पांडवों द्वारा अपने अज्ञातवाश के काल में निर्मित किया गया था।

कोइरौना कटरा क्षेत्र में इटहरा ग्राम के नजदीक बाबा गंगेश्वर नाथ धाम अपने आप में एक पौराणिक गाथा कहता है इन सभी के साथ हरिहर नाथ ज्ञानपुर, बाबा बड़े शिव गोपीगंज, चकपड़ौना नाथ कौलापुर, आदि धार्मिक स्थल भदोही क्षेत्र के भव्य धार्मिक इतिहास के साक्ष्य एवं गवाह है।

भदोही का इतिहास भरों और मुगलों से जोड़ना (स्यडो सेक्यूलरिज्म) छद्मधर्म निरपेक्षवाद है-

भदोही जनपद का इतिहास निश्चित रूप से एक भव्यता और उत्कर्ष को समाहित किये हुए है जिसे चंहुमुखी दृष्टि से देखा जा सकता है यहां का इतिहास जितना दृढ़ भरों और मुगलों के साथ है उतना ही मजबूत और सक्षम धार्मिक और आर्थिक क्षेत्र से है।

दरसल जब भदोही को भरों और मुहम्मद गोरी के युद्ध के साथ जोड़कर देखा जाता है तथा यह बतलाने का प्रयास होता है कि भदोही भरों से मात्र संबंधित है तो निश्चित रूप से विद्वानों के इस लेखन प्रयास पर एक आंशका स्वाभाविक है इनके द्वारा  या तो जानबूझ कर भदोही के इतिहास को संकुचित किया जाता है और भर तथा मुगल से जोड़कर छद्मधर्म निरपेक्षवाद को बढ़ावा दिया जाता है अथवा इन विद्वानों के द्वारा भदोही के इतिहास और मिट्टी को समझने का प्रयास ही नहीं किया गया मेरे द्वारा जहां तक भदोही के इतिहास को समझने के विभिन्न साक्ष्यों और स्त्रोतों और बुद्धिजीवियों का सहारा लिया गया यह बात स्पष्ट है कि भदोही भर और मुगल से बहुत पहले था यह सहज ही उभरता है कि मोहम्मद गोरी और भर से कई हजार वर्ष पूर्व रामायण और महाभारत काल से भदोही का संबंध है चाहे वो अज्ञातवाश में तिलेश्वर बाबा का निर्माण अथवा रामायण काल में सीता का समाहित होना निश्चित रूप से यदि भदोही के इतिहास का वास्तविक समझ रखनी है तो इसे कई खंडों में समझना पड़ेगा जहां एक ओर कालीन आर्थिक जगत ने इसे समृद्धता प्रदान करता है वहीं धार्मिक दृष्टि और इतिहास परंपरा तथा गौरव का ज्ञान प्राप्त कराता है इसके साथ ही मुगलों और भरों का विद्रोह तत्कालीन राजनीतिक दशाओं को स्पष्ट करता है। इस प्रकार से भदोही का इतिहास सर्वांगीण, समग्र और समृद्धि है जो लोग मात्र कालीन, मुगल और भर से जोड़ते हैं वो कहीं न कहीं संकुचित मानसिकता का परिचय देकर यहां के सामाजिक और धार्मिक इतिहास को धूमिल करने का प्रयास करते हैं।

 

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